A-39 मसीहत या शोहरत!
सृष्टि की शुरुआत से ही यह देखा गया है कि मनुष्य अपने पापमय स्वभाव के कारण ताकत और ऊंचे पद के पीछे भागता आया है। आज भी संसार में ताकत और ऊंचे पद को ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
परंतु परमेश्वर का वचन बाइबिल मनुष्य को नम्रता पूर्वक जीने के लिए प्रोत्साहित करता है। लेकिन खेद की बात है कि इसी नाम और शोहरत की भागदौड़ मसीहत में भी दिखाई देती है जिसकी वजह से मसीही अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य से भटक जाते हैं।
एक मसीही को यह नहीं भूलना चाहिए कि मानव-जाति के उद्धार के लिए परमेश्वर स्वयं स्वर्ग में अपना ऊंचा पद छोड़कर मानव रूप में आया जो येशु मसीह था l येशु ने अपने शिष्यों के पैर धोकर नम्रता से सेवा करने का सबसे बड़ा उदाहरण दिया l येशु ने संसार को सिखाया कि एक अगुवा (LEADER) का हृदय एक सेवक की तरह नम्र और दीन होना चाहिए l
ये सही है कि परमेश्वर अपनी योजना में एक मसीही को ऊंचा पद भी दे सकता है, परंतु मसीही को चाहिए कि वह नाम, शोहरत और ऊंचे पद के लोभ में न पड़े और येशु की तरह सेवाभाव का हृदय रखें।
मसीही जीवन में ऊंचे पद और अधिकार के प्रलोभन को समझने के लिए ये वीडियो देखें।
https://youtu.be/EjOx-cN-sKk
https://youtu.be/jINsrlplFT0